सती दाह
शिव द्रोही जब दक्ष हुए ,
महादेव न रूष्ट हुए,,
दिया निमंत्रण दसों दिशा में,
क्यो वह पुत्री को भूल गए,,
चले सभी महमान चले है,
ऋषि मुनि गन्धर्व चले है,,
ब्रम्हा विष्णु इन्द्र चले है,
तिहुँलोक मेहमान चले है,,
देख रही गौरा महारानी,
संग विराजे औघड़दानी,,
बोली गौरा महासती है,
नाथ चलो पितु के घर जाए,,
हँस बोले भोले भंडारी,
सुनो प्रिय तुम बात हमारी,,
यदि तुम को आदर है पाना ,
बिना बुलाये कहीं न जाना,,
माना दक्ष है पिता तुम्हारे,
पर तुम बसी हो अंग हमारे,,
बहुत मनाया मगर न मानी,
गौरा ने जाने की ठानी,,
शिव ने गण है सँग पठाए,
सँग दक्ष की नगरी आए,,
देखा शिव का घोर अनादर,
दंग हुई अपमान को पाकर,,
किया सती तब यह निश्चय,
न जीना सम्मान गवाकर,,
आत्म योग से अग्नि प्रकट कर,
किया दाह पितु के घर आ कर,,
रोते रोते नन्दी आए
दीना सारा हाल सुनाए,,
डमडम डमरू बोल रहा है,
फण शेषनाग का डोल रहा,,
कर रहे रूद्र प्रलयनर्तन ,
उठ रही ध्वंश लपटों से,
जग त्राहि त्राहि बोल रहा,,
हैं दसों दिशाएँ कम्प्यमान,
सागर का जल भी खौल रहा,,
लट खीच धरा पर है मारी,
कर वीरभद्र का आवाह्न,
पलय की ऐसी लहर चली,
मेघो का सीना चीर चली,,
कट कट कर गिरने लगे शीश,
बह चली रुधिर की एक नदी,,
शिव महाकाल बन कर आए,
देखी जो सती की मृत देह,
है शीश दक्ष का काट दिया,
हो गया यज्ञ भी छिनभिन,,
पापी को प्रभु ने दण्ड दिया,
वैरागी में अनुराग जगा,
शिव को शव से है मोह जगा,
ले घूम रहे पर्वत पर्वत,,
न खुद का कोई होश रहा,
महाशक्ति जब रोती है ,
सृष्टि असंतुलित होती है,,
सृष्टि का संतुलन रखने को,
जीवन की नैया खेने को,
हरि युक्ति नई लगते है,
अपना हरि चक्र चलाते हैं,,
इक्यावन खण्डों मे कट कर,
गिरा शक्ति का शव देखो
जहाँ जहाँ गिरा शव शक्ति का,
वह सब है शक्तिपीठ बने,,
मोह भंग हुआ तन्द्रा टूटी ,
शिव को तब सृष्टि की सूझी,,
दिया दक्ष को जीवन दान,
शिव करते जग कल्याण,,
जन जन मस्ती में झूम रहा,
जग हर हर शम्भू बोल रहा,,,
जय औघड़दानी भूतेश्वर,
है तुम्हे नमन जय विश्वेश्वर,,
Gopal Gupta" Gopal"
Priyanka06
21-Jul-2023 04:31 PM
बिष्णु को विष्णु कर दीजिए
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Priyanka06
21-Jul-2023 04:30 PM
बहुत सुंदर रचना पलय को प्रलय कर दीजिए
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Gunjan Kamal
20-Jul-2023 10:59 PM
बहुत खूब
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